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मंगलवार, 19 अगस्त 2014

सती बिहुला की जन्मस्थली है नवगछिया


राजेश कानोडिया, नवगछिया । आज जहां अंग जनपद से लेकर बिहार के कोने कोने और बंगाल तथा यूपी के अलावा देश के कई हिस्सों में सती विहुला विषहरी की धूमधाम से पूजा की जा रही है। विहुला विषहरी की पूजा लोक परंपराओं के अनुकूल यहाँ की विशिष्ट देन है। उसी महासती विहुला की जन्मस्थली है नवगछिया। जो कोसी नदी के किनारे बसा है। जहां उसने अमृत पोखर में अपने मृत पति बाला लखेन्द्र को लाकर जीवित किया था। 
महा प्रतापी सती विहुला का जन्म नवगछिया बाजार से सटे गाँव उजानी के ही बड़े समृद्धशाली सौदागर वासुदेव उर्फ बासु सौदागर के घर हुआ था। बचपन से ही विहुला काफी धार्मिक प्रवृति की थी। वह बचपन से ही सहेलियों के साथ सोने की नौका पर चढ़ कर नहाने जाती थी। उस नाव के सिक्कड़ भी सोने के ही बने थे। 
कुछ ही दिनों बाद से जिसके तेज और प्रताप की चर्चा दूर दूर तक फैलने लगी थी। जिसने अपने प्रताप से होने वाले ससुर चांदो सौदागर को लोहे के चने से दाल बना कर दिखा दिया था। विधि के विधान के तहत ही विहुला की शादी अंग जनपद की राजधानी चम्पा नगर के महान शिव भक्त चंद्रधर सौदागर उर्फ चांदो सौदागर के सातवें पुत्र बाला लखेन्द्र से हुई थी। 
जानकारों के अनुसार बाला लखेन्द्र को भगवान विश्वकर्मा द्वारा निर्मित लौह गृह में सुहाग रात के समय ही मनियार नाग ने डस लिया था। अपने मृत पति के शरीर को मंजूषा में ले चम्पा नदी के श्यामापुर घाट से गंगा नदी के रास्ते कुरसेला होते हुए कोसी नदी की धारा के सहारे वापस उजानी गाँव के अमृत पोखर तक लाकर यमराज से पति के प्राण वापस लायी थी। इस दौरान रास्ते में महा सती विहुला को अपने प्रताप के बल पर नेतुला धोबिन, टुन्नी राक्षसी से भी सामना करना पड़ा था। बाला लखेन्द्र को जिंदा कराने के बाद महासती विहुला ने हठी एवं महान शिव भक्त चांदो सौदागर से विषहरी की पूजा करायी। तब से ही अब तक देव लोक और पाताल लोक के बाद पृथ्वी लोक पर विषहरी की पूजा चल रही है। 
नवगछिया के उजानी गाँव में वह अमृत पोखर आज भी विद्यमान है। जो पूरी तरह से सूख चुका है। जिसकी जगह पर किसी तरह की खेती भी नहीं हो पाती है। वह पूरी तरह से उपेक्षित है। 

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