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मंगलवार, 26 सितंबर 2017

चांद बिहारी अग्रवाल : कभी बेचते थे पकौडे, आज  ज्वेलरी के भरोसे लिख डाली सफलता की एक कहानी


नव-बिहार न्यूज नेटवर्क (NNN), पटना : जहां सफलता किसी का मोहताज नहीं होती. वहीं मेहनतकश लोगों को अपनी मेहनत पर भी उतना ही भरोसा होता है. इसी प्रकार से जीरो से शुरू करके जहां जीत लेने का हुनर कम ही लोगों के पास होता है. लेकिन मेहनत का कोई विकल्प भी नहीं होता है. इसकी जीती—जागती नजीर बिहार के जाने-माने ज्वैलर चांद बिहारी अग्रवाल हैं. चांद बिहारी मुंह में चांदी का चम्मच लेकर पैदा नहीं हुए थे. उन्होंने बचपन में गलियों में पकौड़े बेचे हैं, फुटपाथ पर फेरी लगाकर साड़ियां बेची हैं. एक दुकान से दूसरी दुकान पर घूमकर रत्न और नगीने भी बेचे हैं. आज उन्होंने मेहनत के बूते खुद का आलीशान अंपायर खड़ा किया है. पटना के बुद्ध मार्ग के व्हाइट हाउस में स्थित इनका प्रतिष्ठान चाँद बिहारी अग्रवाल ज्वैलर्स आज बिहार में भरोसे का सिंबल बन गया है.

बिहार में जैसे ही आप ज्वैलरी के बारे में सोचेंगे, खुद ब खुद आपको चांद बिहारी अग्रवाल ज्वैलरी हाउस याद आ जाएगा. चांद बिहारी अब 61 साल के हो चुके हैं. बचपन में वह राजस्थान के जयपुर शहर की गलियों में अपनी मां के साथ पकौड़े बेचते थे. जयपुर से पटना तक की उनकी यात्रा में पांच दशक लग गए. लेकिन उनकी मेहनत ने जहां को जीत लिया है.

चांद बिहारी अग्रवाल, 1973 में आए थे पटना, पटना रेलवे स्टेशन के फुटपाथ पर बेचते थे साड़ियां

जयपुर के नगरसेठ थे पिता

अपनी इस संघर्ष यात्रा को याद करते हुए चांद बिहारी अग्रवाल बताते हैं कि,’ मेरा जन्म 20 दिसंबर 1956 को जयपुर में हुआ था. पिता का ट्रेडिंग का बड़ा काम था. उनके पिता बड़े सौदों में भी हाथ आजमाने से डरते नहीं थे. जोखिम भरे सौदों से उन्हें इतना मुनाफा हुआ कि वह उस जमाने में घोड़ागाड़ी पर चला करते थे. इसे उस जमाने में समृद्धि का प्रतीक समझा जाता था. लेकिन अचानक वक्त पलट गया, व्यापार में घाटा हुआ. इस घाटे में मुनाफे के साथ ही परिवार की जमा-पूंजी भी डूब चुकी थी.

जब माँ के साथ बेचे पकौड़े

जब चांद बिहारी का जन्म हुआ तो उनका परिवार गहरे आर्थिक संकट में डूब चुका था. इसी कारण से वह कभी स्कूल भी नहीं गए. परिवार को चलाने की पूरी जिम्मेदारी उनकी मां नवल देवी अग्रवाल ने अपने कंधों पर ले ली. सन् 1966 में जब चांद बिहारी सिर्फ 10 साल के थे, उन्होंने अपनी मां के साथ ठेले पर जयपुर की गलियों में पकौड़े बेचने शुरू कर दिए. चांद बिहारी के साथ उनके बड़े भाई रतन अग्रवाल भी होते थे, जो उस वक्त सिर्फ दो साल बड़े थे. दो छोटे भाई भी थे, दोनों स्कूल जाते थे, जबकि बहन घर का सारा काम किया करती थी.

अपने बड़े बेटे पंकज अग्रवाल के साथ चांद बिहारी अग्रवाल

पूरे घर की थी जिम्मेदारी

चांद बिहारी अग्रवाल उन मुश्किल दिनों को याद करते हुए बताते हैं कि,’ मैं अपनी मां के साथ रोज 12—14 घंटे लगातार काम करता था. इतनी मेहनत के बाद भी अपने घर का चूल्हा जलाने के लिए हम बमुश्किल 100 रुपये ही कमा पाते थे. स्कूल जाना हमारे लिए सपने जैसा था. मैं और अधिक सफल होता अगर मैंने कम से कम प्राथमिक शिक्षा हासिल की होती, लेकिन परिस्थितियों को ये मंजूर नहीं था.’ मात्र 12 साल की उम्र में चांद बिहारी ने जयपुर की एक साड़ी की दुकान में बतौर सेल्समैन नौकरी कर ली. उनकी महीने भर की तनख्वाह सिर्फ 300 रुपये थी. चांद बिहारी याद करते हैं कि,’मेरे बड़े भाई रतन ने मुझे वह नौकरी दिलवाई थी. मेरी तनख्वाह उस वक्त हमारे जैसे गरीब परिवार के लड़के के लिए बहुत बड़ी बात थी.’

भाई लेकर आए थे पटना

कुछ साल बीतने के बाद सन 1972 में उनके भाई रतन की शादी हो गई. उन्होंने अपनी शादी में मिले 5000 रुपये से जयपुरी चुनरी साड़ी के कुछ नमूने खरीद लिए. एक साड़ी की कीमत उस वक्त 18 रुपये हुआ करती थी. साड़ियां लेकर वह पटना आ गए, जहां पर उनके रिश्तेदार रहा करते थे. किस्मत से साड़ियां यहां पर हाथों—हाथ बिक गईं. इसके बाद उनके भाई इन साड़ियों को लोकल दुकानों को सप्लाई करने लगे. रतन को व्यापार में हाथ बंटाने के लिए किसी मददगार की जरूरत पड़ी तो वह चांद बिहारी को 1973 में पटना लेकर आ गए.

अपने भव्य जूलरी शोरूम में ग्राहकों के साथ चांद बिहारी अग्रवाल

फुटपाथ से शुरू किया था सफ़र

चांद बिहारी अग्रवाल कहते हैं कि,’हमारे पास दुकान किराए पर लेने के लिए पैसे नहीं थे, लेकिन हमारे भीतर उत्साह बहुत था. हमने पटना रेलवे स्टेशन के फुटपाथ पर बैठकर साड़ियां बेचना शुरू कर दिया. उन दिनों सड़क किनारे धूप और उमस में बैठकर कारोबार करना वाकई बहुत कठिन था. हमें उसी हालत में लोगों को अपने प्रोडक्ट खरीदने के लिए समझाना भी होता था. हम उस वक्त पटना में राजस्थानी साड़ियां बेचने वाले अकेले व्यापारी थे. यही बात हमें बाकी लोगों से अलग बना देती थी. हमने इसके जरिए 250—300 रुपये रोज की कमाई शुरू कर दी. जबकि हम सिर्फ 25 फीसदी ही मुनाफा लेते थे.’

जब लगने लगा सब ठीक है

चांद बिहारी कहते हैं कि,’ हम एक दुकान से दूसरी दुकान पर घूमकर दुकानदारों को हमारी साड़ियां बेचने के लिए कहते थे. इससे हमने अपना खुद का रिटेल नेटवर्क खड़ा कर लिया. इसके बाद पूरे बिहार से कारोबारी हमारे पास साड़ियां खरीदने के लिए आने लगे, फिर हमने थोक कारोबार भी शुरू कर दिया. अगले ही साल हमने कदमकुआं में 300 वर्ग फीट की दुकान किराए पर ले ली. हमें लगने लगा कि अब सब कुछ ठीक हो गया है क्योंकि हमारी महीने की बिक्री करीब 80—90 हजार रुपये के बीच होने लगी थी.’

अपनी अगली पीढ़ी के साथ चांद बिहारी अग्रवाल

वक़्त ने फिर ली परीक्षा

लेकिन चांद बिहारी का इम्तहान अभी भी बाकी था. उनकी दुकान में सन् 1977 में डकैती पड़ गई. ये वही साल था जब चांद बिहारी अग्रवाल की शादी हुई थी. इस डकैती ने खून—पसीने से बनाए हुए उनके कारोबार को तबाह कर दिया था. वे याद करते हैं कि,’उस डकैती में हमारी चार लाख रुपये की पूंजी लूट ली गई थी. इसके अलावा बड़े भाई रतन भी एक साल पहले ही साड़ी का कारोबार छोड़ चुके थे. ये हमारी जिन्दगी का सबसे बुरा दौर था. जब न तो मेरी जेब में पैसे थे और न ही कोई मदद करने वाला था.’

नए कारोबार में आजमाया हाथ

उन्हें बचाने के लिए उनके भाई रतन फिर से आगे आए. उन्होंने सलाह दी कि उन्हें रत्न के कारोबार में हाथ आजमाना चाहिए. रतन खुद भी कोलकाता में इसी कारोबार में लगे हुए थे. चांद बिहारी कहते हैं कि,’ हमें इस कारोबार का कोई अनुभव नहीं था. लेकिन मैंने पूरे बिहार में घूमना शुरू किया. मैं रत्नों के साथ एक दुकान से दूसरी दुकान में जाया करता था. हर रत्न का औसत मूल्य 5000 रुपये हुआ करता था. हम करीब 500 दुकानों से जुड़ चुके थे. हर बेचे हुए रत्न के साथ ही धंधे के बारे में जानकारी भी बढ़ती जा रही थी. भगवान की दया से इस कारोबार में भी उन्हें मुनाफा होने लगा और व्यापार चल निकला. धीरे—धीरे जिन्दगी की गाड़ी पटरी पर लौटने लगी.’

10 साल बाद मिली सफलता

दस साल तक लगातार काम करने के बाद 1988 में उन्होंने करीब 10 लाख रुपये की पूंजी जोड़ ली. इसके बाद उन्होंने सोने की जूलरी के कारोबार में कदम रख दिया. रत्न और सोने की जूलरी के कारोबार ने अगले 12 सालों में उन्हें स्थापित कर दिया. चांद बिहारी की मेहनत और ईमानदारी के कारण पूरे बिहार और उत्तर प्रदेश से ग्राहक उनके पास आने लगे.

चांद बिहारी अग्रवाल को 2012 में किया गया था इंडियन अचीवर्स अवार्ड से सम्मानित

हाथ बटाने आगे आया बेटा

सन् 2002 को चांद बिहारी अग्रवाल अपनी जिन्दगी में बेहद खास मानते हैं. वजह यह है कि इसी साल 19 साल की उम्र में बड़े बेटे पंकज ने बिजनेस में हाथ बंटाना शुरू कर दिया. पंकज अग्रवाल पटना यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएट हैं. बेटे के साथ साझेदारी में चांद बिहारी अग्रवाल ने पार्टनरशिप फर्म अग्रवाल ब्रदर्स की स्थापना की. उन्होंने पटना के बुद्ध मार्ग स्थित अपने घर से सटे इलाके में ही शोरूम खोल दिया. इसी साल उन्होंने रत्न का कारोबार भी बंद कर दिया क्योंकि पिता—पुत्र ने महसूस किया कि गहनों के कारोबार में आगे बढ़ने के मौके ज्यादा अच्छे हैं. चांद बिहारी के बेटे पंकज अब 37 साल के हो चुके हैं. पंकज कहते हैं कि,’ हमारे पास बिजनेस को और आगे ले जाने को अब सब कुछ है. मेरा छोटा भाई प्रकाश भी अब मुंबई में अपना जूलरी शोरूम चला रहा है.’ पंकज बताते हैं कि,’ उनका कारोबार अब हर साल 10—20 फीसदी की ग्रोथ हासिल कर रहा है. मौजूदा वक्त में वह जूलरी के थोक और खुदरा दोनों कारोबार में काम कर रहे हैं. जूलरी हम वही बेचते हैं जो हमारी कंपनी में ही डिजाइन होती है.’

मिला मेहनत को सम्मान

अब चांद बिहारी की मेहनत को पहचान भी मिलने लगी है. उन्हें 2012 में व्यापार में उत्कृष्टता के लिए ‘इण्डियन अचीवर्स अवार्ड’ से सम्मानित किया गया था. ये पुरस्कार उन्हें इण्डियन अचीवर्स फोरम, दिल्ली के आयोजन अचीवर्स समिट में दिया गया था. एक साल पहले ही उन्हें आॅल इण्डिया बिजनेस एंड कम्यूनिटी फाउंडेशन ने सिंगापुर में सम्मानित किया था.

नहीं भूले हैं अपनी जड़ों को

आसमान की बुलंदियों को छूने वाले चांद बिहारी अग्रवाल आज भी अपनी जड़ों को नहीं भूले हैं. उन्होंने श्याम मंडल और समस्त पटनावासियों के सहयोग से 100 कमरों की धर्मशाला का निर्माण राजस्थान के खाटू श्याम जी मन्दिर में करवाया है. इसके अलावा उन्होंने तमाम गरीबों और जरूरतमंदों का मुफ्त आॅपरेशन भी करवाया है. नई पीढ़ी के लिए चांद बिहारी अग्रवाल सलाह देते हैं कि,’ अपनी कोशिशों में ईमानदार बनो और अपने सपनों पर यकीन रखो. हर चीज संभव है अगर आपमें मजबूत इच्छाशक्ति हो.’

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