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शुक्रवार, 22 सितंबर 2017

‘साथी’ ने केले के फाइबर से बनाया ‘सैनेटरी पैड’, मुफ्त हो रहा वितरण

नव-बिहार न्यूज नेटवर्क (NNN): केला स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से तो एक फायदेमंद फल है, इस बात से तो हम सब वाकिफ हैं, लेकिन क्या आप यह जानते हैं कि केले के पेड़ से
सेनेटरी नैपकिन भी बन सकता हैं? अगर आप नहीं जानते तो यह जानकारी आपके लिए बहुत फायदेमंद है. अहमदाबाद की  एक कंपनी ‘साथी’ ने माहवारी स्वच्छता के क्षेत्र में क्रांतिकारी परिवर्तन के लिए एक सौ प्रतिशत ‘बायोडिग्रेडेबल’ नैपकिन बनाने की शुरुआत की है, इस नैपकिन का निर्मान केले के फाइबर से किया जा रहा है. केले के थम से फाइबर निकालकर उसे कई तरह की प्रक्रियाओं से गुजारने के बाद सेनेटरी नैपकिन का निर्माण किया जाता है. यह सैनिटरी नैपकिन स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से बहुत फायदेमंद है, साथ ही इसकी सबसे बड़ी विशेषता है कि यह सौ प्रतिशत बायोडिग्रेडेबल है. इससे पर्यावरण को कोई नुकसान नहीं पहुंचता है.
हमारे देश की यह एक सच्चाई है कि मात्र 12 प्रतिशत महिलाएं माहवारी के दौरान सेनेटरी नैपकिन का प्रयोग करती हैं. आज भी अधिकतर महिलाएं माहवारी के दौरान कपड़े का प्रयोग करती हैं. लेकिन कपड़े की साफ-सफाई और पीरियड्‌स के दौरान हाइजीन का ख्याल ना रखने के कारण महिलाओं में सर्वाइकल कैंसर, ल्यूकोरिया और यूरिन इंफ्केशन जैसी बीमारियां बढ़ती जा रही हैं. 
सैनिटरी पैड की जगह घरेलू पैड का इस्तेमाल ज्यादा होने के पीछे कई कारण हैं. एक तो लोग टैबू में फंसे हैं इसलिए सैनेटरी नैपकिन को यूज नहीं करना चाहते, साथ ही सैनेटरी नैपकिन का महंगा होना भी इसके इस्तेमाल में एक बड़ा बाधक है. इन परिस्थितियों को समझते हुए ‘साथी’ ने एक सस्ता और पूरी तरह नष्ट होने वाला सैनेटरी पैड बनाया, जिसके इस्तेमाल से किसी तरह की भी बीमारी का खतरा नहीं है. ‘साथी’ पैड का निर्माण केले के रेशों से किया जाता है, जिसकी अवशोषण क्षमता बहुत उच्च है. 
केले के रेशे के बारे में कहा जाता है कि इसमें अवशोषण की क्षमता प्राकृतिक रूप से बहुत अधिक होती है. चूंकि भारत में 1.20 लाख एकड़ जमीन पर केले की खेती होती है, इसलिए देश में केले के थम की कोई कमी नहीं है. यह सैनेटरी नैपकिन पूरी तरह से प्राकृतिक , रसायन मुक्त, प्रयोग करके फेंकने योग्य, गंध मुक्त और बेहद पतला होने के कारण इस्तेमाल में भी बहुत आरामदायक है.

आमतौर पर बाजार में बिकने वाले सैनेटरी पैड में प्लास्टिक का इस्तेमाल होता है. ज्यादा देर तक इस पैड का इस्तेमाल कई बार बीमारियों का कारण बन रहा है, साथ ही इसे नष्ट करना भी एक बड़ी समस्या है, जबकि ‘साथी पैड’ आसानी से छह महीने में नष्ट हो जाता है.
इस ‘बायोडिग्रेडेबल’ पैड का झारखंड के लोहरदगा जिले के भंडरा ब्लॉक में वितरण किया जा रहा है. इस संबंध में जानकारी देते हुए आरोग्य फाउंडेशन अॅाफ इंडिया, एकल आरोग्य योजना के स्टेट कॉडिनेटर डॉ मृत्युजंय ने बताया कि ‘साथी’ कंपनी ने हमारी संस्था के साथ मिलकर इस पैड का मुफ्त वितरण ग्रामीण इलाकों में कराना शुरू किया है. 
अभी यह प्रोग्राम सिर्फ भंडरा ब्लॉक में चल रहा है. डॉ मृत्युजंय ने बताया कि जनवरी 2017 से हमने ट्रॉयल के रूप में 30-40 महिलाओं को चुनकर उनके बीच यह पैड वितरित किया, लेकिन मई महीने से ब्लॉक की 80 प्रतिशत महिलाओं के बीच यह पैड वितरित किया जा रहा है. उन्होंने बताया कि पैड का रिस्पांस अच्छा आ रहा है जिसके कारण हम भविष्य में इसका वितरण सिल्ली में भी करने की योजना बना रहे हैं. आरोग्य फाउंडेशन अभी झारखंड के पांच ब्लॉक में काम कर रहा है, जिसमें भंडरा (लोहरदगा), सिल्ली (रांची), गोला(रामगढ़), गोविंदपुर (धनबाद) और बरवाडीह (पलामू) शामिल है.
एकल अभियान एक संस्था है जिसके कार्यक्रम आरोग्य के तहत ग्रामीण इलाकों में महिलाओं को स्वच्छता का महत्व बताया जाता है और उन्हें सशक्त करने के लिए कई कार्यक्रम चलाये जा रहे हैं. इसी कार्यक्रम के तहत महिलाओं को माहवारी स्वच्छता के संबंध में भी जानकारी दी जाती है और उन्हें जागरूक किया जाता है. इस काम में संस्था गांव की महिेलाओं का सहारा लेती हैं और 30 महिलाएं ब्लॉक स्तर पर काम करती हैं, उन्हें आरोग्य सेविका कहा जाता है, उन्हें छह महिलाएं निर्देशित करती हैं, जिन्हें संयोजिका कहा जाता है और इन सब का ब्लॉक हेड होता है संघ प्रमुख. आरोग्य फाउंडेशन अॅाफ इंडिया एकल अभियान के इस पूरे कार्यक्रम को फंड उपलब्ध कराती है.
इसके कार्यक्रम के तहत महिलाओं को अपने स्वास्थ्य के प्रति जागरूक किया रहा है. उनके बीच आयरन और फोलिक एसिड की गोली का वितरण किया जाता है. साथ ही उन्हें पोषण वाटिका और औषधि वाटिका लगाने के लिए प्रेरित किया जाता है, ताकि उनका स्वास्थ्य ठीक रहे. पोषण वाटिका में साग सब्जी लगाने की योजना है, जबकि औषधि वाटिका में औषधीय पौधे.
साथी कंपनी की शुरुआत वर्ष 2015 में हुई थी. इस कंपनी का निर्माण एमआईटी (अमेरिका), हार्वर्ड और निरमा के स्नातकों ने मिलकर किया है. यह महिलाओं की कंपनी है, जिसमें चार लोग शामिल हैं. अमृता सहगल जब अमेरिका में एमएनसी में उत्पादन इंजीनियर के रूप में काम करती थीं, उसी वक्त उनके दिमाग में भारत में महिलाओं तक यह सैनेटरी नैपकिन पहुंचाने का ख्याल पनपा था. 
साभार -रजनीश आनंद

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