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गुरुवार, 26 अक्तूबर 2017

छठ: जरूरी है, परंपरा को जिंदा रखने के लिए

नीरज कुमार झा की खास खबर
छठ जरूरी है, धर्म के साथ साथ समाज के लिए। क्योंकि हम सभी अपनी पहचान से कट रहे है। छठ जरुरी है बहु बेटों के लिए जिनके घर आने का ये बहाना है। छठ उस माँ के लिए
जिन्हें अपनी संतान को देखे सालो  हो जाते हैं । उस परिवार के लिए जो टुकड़ों में बंट गया है।
ये छठ जरूरी है उन बच्चो लिए जिन्हें नहीं पता की दो कमरों से बड़ा भी घर होता है। उनके लिए जिन्होंने नदियों को सिर्फ किताबों में ही देखा है। ये छठ जरूरी है उस परम्परा को जिन्दा रखने के लिए जो समानता की वकालत करता है जो बताता है कि बिना पुरोहित भी पूजा हो सकती है, जो सिर्फ उगते सूरज को नहीं डूबते सूरज को भी प्रणाम करता है ये दर्शाने के लिए जिसकी उत्पप्ति हुयी है उसका नाश होना तय है।
ये छठ जरूरी है गागर निम्बू और सुथनी विलुप्त होने के कगार पर पहुंच रहे फलों को जानने के लिये। सूप और दौउरा को बनाने वालो भी हमारे समाज के एक अंग है ये बताने के लिए कि इस समाज में उनका भी महत्त्व है। ये छठ जरूरी है उन दंभी पुरुषों के लिए जो नारी को कमजोर समझते हैं। 
बहरहाल लोक आस्था का महा पर्व छठ को लेकर पूरा वातावरण भक्तिमय हो गया है। घर हो या बाजार हो या हो चौक चैराहे या फिर घाट में चल रही तैयारी पर छठी माया की गीत गूंज रही है। पूरी आस्था के साथ लोग इस पर्व को मनाने मै लगे है  | विदेश और प्रदेशों में नोकरी कर अपने परिवार के साथ जीवकोपार्जन कर रहे एक लंबे समय बाद छठ पर्व के बहाने घर पहुँच है  बहु बेटे पोते पोतिया का इंतजार कर रही बूढी माँ  को छठ के नाम पर घर आने पर सारा दुःख दर्द भूल कर माँ की खुशी का ठिकाना नही होता है  इस ख़ुशी के माहोल मै लोगो ने अस्त गामी भगवान भास्कर को अर्घ देकर बेसब्री से सुबह का इंतजार कर रहे है जल्दी और उदय मान भगवान भास्कर को दूध का अर्घ (धार) देकर समाप्ति की जाएगी 

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