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गुरुवार, 1 फ़रवरी 2018

ओह माय गॉड! जिसे देवी समझ दशकों से पूजा कर रहे थे लोग वो तो 'देवता' निकले

ओह माय गॉड! जिसे देवी समझ दशकों से पूजा कर रहे थे लोग वो तो 'देवता' निकले

नव-बिहार न्यूज नेटवर्क, लखीसराय। ओह माय गॉड ! जिसे देवी समझ पूजा कर रहे थे लोग वो तो 'देवता' निकले। खुदाई में मिली जिस मूर्ति की पूजा दशकों से श्रद्धालु महिषासुरमर्दिनी यानि देवी दुर्गा मानकर करते आ रहे थे असल में वह अद्भूत मूर्ति भगवान बुद्ध के स्वरूप अवलोकितेश्वरा की है और तो और उनके साथ नारी रूप में भी जो मूर्ति है वह भी बौद्ध देवी मैत्रेयी की बताई गई हैं। 

मूर्तियों की हुई पहचान
लखीसराय के जयनगर लाली पहाड़ी पर मंदिरनुमा झोपड़ी में ढाई दशक से भी पहले से रखी गई मूर्तियों की पहचान आखिरकार हो चुकी है। जर्मनी की प्रख्यात इतिहासकार क्लाउडीन पिक्रों ने लाली पहाड़ी स्थित इन मूर्तियों को नृत्य करते अवलोकितेश्वरा का स्वरूप बताया है, जबकि नारी के रूप में दिख रही मूर्ति देवी मैत्रेयी की बताई गई है। अवलोकितेश्वरा भगवान बुद्ध के ही एक अवतार के रूप में जाने जाते हैं, जबकि मैत्रेयी बौद्ध धर्म की ही देवी है। अबतक इन मूर्तियों की पूजा स्थानीय लोग महिषासुरमर्दिनी के रूप में करते आ रहे थे। 

डीआईजी विकास वैभव की पहल 
मूर्तियों की पहचान होने के पीछे इतिहास और पुरातत्व में गहरी रुचि रखनेवाले आईपीएस अधिकारी डीआईजी विकास वैभव और वर्तमान में लाली पहाड़ी पर खुदाई कार्य का नेतृत्व कर रहे प्रो. अनिल कुमार महत्वपूर्ण कड़ी रहे। प्रो. अनिल के निमंत्रण पर वर्ष 2016 में बिहार विरासत यात्रा में डीआईजी पहली बार लाली पहाड़ी पहुंचे थे। फिर भागलपुर में बतौर डीआईजी ज्वाइन करने और मुंगेर के प्रभार में रहते वह कई बार यहां आए। ऐतिहासिक साइटों के भ्रमण और अवलोकन के आधार पर अपने ब्लॉग पर कई सारे आर्टिकल लिखते रहते हैं। डीआईजी विकास वैभव ने बताया कि ​लाली पहाड़ी पर मूर्तियों के अवलोकन के दौरान उन्होंने जो तस्वीरें ली थी, उन्हें क्लाउडीन को भेज कर पहचान की जिज्ञासा जताई थी। क्लाउडीन ने अवलोकितेश्वरा के नृत्य करने की मुद्रा में मूर्ति की पहचान की है। इधर, विश्व भारती विवि, शांति निकेतन के शिक्षक सह पुरातत्वविद् प्रो. अनिल कुमार कहते हैं कि ढाई दशक से भी ज्यादा समय से इन मूर्तियों के मौजूद रहते इनकी वास्तविक पहचान नहीं हो पाई थी। अपने पुराने शोधों के आधार पर और तस्वीरों का अवलोकन करने के बाद जर्मन इतिहासकार क्लाउडीन ने इन मूर्तियों की पहचान की है।

कौन हैं क्लाउडीन पिक्रों, यह भी जान लीजिए
जर्मन इतिहासकार क्लाउडीन पिक्रों 1990 में लखीसराय आ चुकी हैं। यहां के विभिन्न पुरातात्विक साइटों का भ्रमण और यहां की मूर्तियों का अवलोकन करने के बाद कई रिसर्च पेपर लिख चुकी हैं। यहां की मूर्तियों पर सिल्क रूट एशिया नामक रिसर्च जॉर्नल में उनका लेख प्रकाशित है। वह लगातार भारत के पुरातत्वविदें और इसमें अभिरुचि रखनेवालों के संपर्क में बनी रहती हैं। 

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