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गुरुवार, 5 अप्रैल 2018

अभिभावकों की जेब पर पड़ रहा है डाका, अधिकारी कुम्भकर्णी निद्रा में

नव-बिहार न्यूज एजेंसी (NNA), नवगछिया। अनुमंडल क्षेत्र में कुकूरमुत्ते की तरह उग आये निजी विद्यालयों की मनमर्जी इन दिनों चरम पर है। प्रत्येक साल रिएडमिशन के नाम पर जहां अभिभावकों की जेब पर डाका डाला जाता है, वहीं किताब के प्रकाशक बदल कर अभिभावकों की कमर भी तोड़ी जा रही है।

अनुमंडल क्षेत्र में सैकड़ों की संख्या में विद्यालय संचालित हैं और प्रत्येक सप्ताह एक विद्यालय खुल रहे हैं। इन सब के बीच शिक्षा विभाग सब कुछ जानते हुए भी कुंभकर्णी निंद्रा में सोया है। जबकि अधिकांश विद्यालयों का निबंधन भी नहीं है। फिर भी उन्हें सरे आम अभिभावकों को लूटने की खुली छूट इसलिए मिली हुई है कि अधिकारी कुम्भकर्णी निद्रा में सोये पड़े हैं।

स्कूल प्रबंधन की मनमानी का आलम यह है कि एक ही पैटर्न सीबीएसई पर चलने वाले स्कूलों में एक ही कक्षा के लिए विभिन्न स्कूलों में विभिन्न प्रकाशकों की किताबें पढ़ाई जा रही है। स्कूल में विभिन्न त्योहारों व विभिन्न कार्यों के लिए स्कूल की मनमानी फीस और किताबों की बोझ से न सिर्फ अभिभावक के हालत खास्ता व खराब है बल्कि बच्चे भी ऐसी कुव्यवस्था के पीछे परेशान हो रहे हैं।

स्कूल प्रबंधन और डीलर्स तय करते हैं सिलेबस -

क्षेत्र के अभिभावकों की मानें तो विभिन्न निजी स्कूलों में एक ही वर्ग में अलग अलग विषयों की किताब अलग अलग प्रकाशकों की नजर आती है। अर्थात जैसे गणित का पब्लिकेशन गोयल होगा तो अंग्रेजी का लाॅगमन और हिंदी का ऑक्सफोर्ड है। इसी प्रकार स्कूल और डीलर्स मिलकर एक कक्षा के लिए सेट बनाते हैं। इसमें कुछ किताबें प्रसिद्ध प्रकाशकों की तो कुछ नए प्रकाशकों की ली जाती है। कारण नए प्रकाशकों की किताबों में सीबीएसई व आईसीएसई से संबंध कुछ नहीं होता। उनमें सामान्य ज्ञान, मोरल साइंस, करंट अफेयर्स, कम्प्यूटर जैसी किताब होती है। इनकी कीमत बहुत ही ज्यादा और कमीशन भी 50 फीसदी से अधिक होती है।

किताबों पर स्कूल को बांधी जाती है कमीशन -

बाजार में उपस्थित बुक डीलर्स की मानें तो निजी प्रकाशकों की किताबें निजी स्कूल प्रबंधन इसलिए चलाता है, क्योंकि वैसे किताबों पर डीलर्स से स्कूल प्रबंधन को 40-50 फीसदी तक कमीशन उसकी जेब में सीधा भेजवा दिया जाता है।

हर साल बदलते रहते हैं प्रकाशक -

शिक्षा विभाग की मानें तो सीबीएसई व आईसीएसई हर साल पाठ्यक्रम नहीं बदलता है। फिर भी स्कूलों की मनमानी का आलम यह रहता है कि स्कूल संचालक एक ही कक्षा की किताबें हर साल बदलते रहते हैं। इस तरह के कालाधंधा में प्रकाशक भी एक-दूसरे का बखूबी साथ देकर अहम रोल निभाते हैं।

एक समान है देशभर में सीबीएसई पैटर्न -

शिक्षितो व बुद्धिजीवियों का कहना है कि देशभर में सीबीएसई पैटर्न का पाठ्यक्रम एक समान है। फिर भी निजी स्कूलों कमीशन के अकूत काली कमाई के चक्कर में अलग- अलग प्रकाशकों की किताबें अपने-अपने स्कूलों में चला रहे हैं। केन्द्रीय विद्यालय में सीबीएसई पैटर्न का एनसीईआरटी की किताबें का मूल्य 2 से 3 सौ रुपये में होता है तो वही किताबें निजी स्कूलों में हजार रूपेय मूल्य के आसपास का होता है। जबकि सीबीएसई यह मानता है कि एक कक्षा की किताबें अधिकतम करीब 8 सौ रुपये मूल्य तक में आ जाना चाहिए।

बिना रजिस्ट्रेशन के चल रहे हैं स्कूल -

शिक्षा में अकूत कमाई को देखते हुए क्षेत्रों में शिक्षा माफियाओ का पांव व पहुंच शिक्षा विभाग के अधिकारियों तक इस कदर जम गया है कि वे बिना रजिस्ट्रेशन कराये हुए धड़ल्ले से स्कूल व कोचिंग संस्थान संचालित कर रहे हैं। बताया जाता है कि अनुमंडलीय क्षेत्रों में अगर सही से जांच पड़ताल शिक्षा विभाग के अधिकारियों द्वारा किया जाएगा तो कईयों स्कूल व कोचिंग संस्थान में ताला लटक सकता है। जो शिक्षा विभाग के आंखों में धूल झोंक कर व अधिकारियों से मिली भगत कर अपना-अपना स्कूल व कोंचिग चला रहे हैं। इस तरह की अवैध कमाई करने वाले पर रोक तो लगेगा ही वहीं अभिभावक भी ठगी के शिकार होने से बच जाएंगे।

शिक्षा अधिकार अधिनियम कानून का नहीं होता पालन -

अनुमंडलीय क्षेत्रों में विभिन्न जगहों पर चल रहे दर्जनों निजी स्कूलों में शिक्षा विभाग के शिक्षा अधिकार अधिनियम कानून का अधिकांश स्कूलों के द्वारा नहीं किया जाता है पालन। स्कूल संचालकों की लापरवाही के कारण शिक्षा अधिकार अधिनियम कानून का खूब किया जाता है उल्लंघन। चाहे स्कूल के अंदर पाठ्यक्रम से संबंधित हो या व्यवस्था या चाहे तो सड़क पर दौरने वाले स्कूल के वाहनों। इतना ही नहीं कक्षा की वर्गीकरण के हिसाब से बच्चों को सही से पढ़ाई करने के लिए बैठने तक की व्यवस्था सही से नहीं रहती है तो वाहनों पर ज्यादा कमाई की उगाही करने के लिए बच्चों को भेड़- बकरी की तरह बैठा कर ढोया जाता है। और तो और अधिकांश स्कूलों में खेल मैदान तक उपलब्ध नहीं है।

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